आखिर ऐसा क्यों होता है?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि कोई किसी टावर पर चढ़ा हो,
लेकिन यह हैरानी की बात अवश्य है कि आधुनिक तनावपूर्ण जिन्दगी ने टावरों का कुछ
लोगों को एक अनोखा प्रयोग करना भी सिखला दिया है। जिस एमटीएनएल के टावर से पूरे
शहर को संचार सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं, उसी टावर को कोई आत्महत्या की धमकी
का ऊँचा मकाम बनाले इसे आधुनिक सभ्यता का वरदान तो कतई नहीं माना जा सकता और न ही
इसे शोले फिल्म के उस मनोरंजक प्रसंग का समतुल्य माना जा सकता है। जिसे ‘खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे’ कहावत का बस फिल्मी संस्करण माना जा सकता है। लेकिन
यहाँ एक मौजूँ सवाल यह भी है कि ऐसा होता ही क्यों है? कि एक सरकारी नौकर और वह भी भारतीय सेना का अनुशासित
सिपाही इस प्रकार की हरकत करता है, पूरे शहर को स्तब्ध कर देता है और मीडिया में
एक चर्चित व्यक्ति बन जाता है। हम बात कर रहे है तमिलनाडु निवासी के. मुत्थू(40) की,
जो भारतीय सेना में 58 एपीओ इंजीनियर्स रेजिमेंट में तेनात है और वो नई दिल्ली
रेलवे स्टेशन के अजमेरी गेट साइड में बने एमटीएनएल के टावर पर 60 फुट ऊपर चढ़ गया
और रक्षा मंत्री से मिलने की जिद्द कर रहा है। यह घटना सामाजिक, प्रशासनिक और
मनौवेज्ञानिक स्तर पर अनेक सवाल खड़े करती है। जब तक इन सवालों की अनदेखी की जाती
रहेगी तब तक तथाकथित तनावग्रस्त धर्मेन्द्र टावर पर चढ़ते ही रहेंगे! और शोले फिल्म के दृश्य दोहराए जाते रहेंगे।
लेकिन इस घटना का सबसे गंभीर पहलू है कि सेना का एक उत्पीड़ित
जवान समस्या को लोकउजागर कर रहा है। उसका स्पष्ट आरोप है कि सेना के अधिकारी
हिटलरशाही दिखाते है और नियमों का मनमाना प्रयोग करके उत्पीड़न के अवसर ढूंढते हैं।
सवाल है ऐसी स्थिति को कैसे बदला जाए और इसे बदले जाने की जिम्मेदारी किसकी हो। इस
इंजीनियर सैनिक की सहज बुद्धि कहती है कि इसकी जिम्मेदारी रक्षा मंत्री पर आती है।
इसीलिए उसका इस बात पर जोर है कि पहले रक्षा मंत्री ए.के एंटोनी को बुलाओ तभी मैं
नीचे उतरुंगा। वास्तव में उसने ऐसा करके कोई अनुचित कार्य नहीं किया, भले ही इसे
सेना के अनुशासन के विरुद्ध माना जाए। इसका सीधा अर्थ है सेना के प्रशासनिक
वातावरण में भी पर्याप्त सुधार की गुंजाइश है और सरकार को इस पर अवश्य ही ध्यान
देना चाहिए। अमेरिका में इस प्रकार की अनेक रिपोर्टें तैयार हुई है, जिनका
निष्कर्ष है कि यदि अधिकारी अपने कार्यालय में निरन्तर तनाव का वातावरण बनाए रखते
हैं तो इससे कार्यालय की कुल कार्य-क्षमता का ह्रास होता है और इससे कहीं न कहीं
तेज विकास की संभावनाएँ भी दरकती हैं।
इस घटना का दूसरा पक्ष है मनोवैज्ञानिक। सभी जानते
हैं कि आज के आधुनिक जीवन शैली में तनाव घुन की तरह लगा हुआ है। सच तो यह है कि आम
भारतीय चाहे छोटे पद पर हो या बड़े पद पर, किसी न किसी कारण से भीतर ही भीतर
जला-भुना बैठा है और मौका आते ही वह अपने आक्रोश को गलत या सही तरीके से व्यक्त कर
देता है। तनावपूर्ण जीवन शैली पर नियन्त्रण करना किसी सरकार का काम नहीं हो सकता,
लेकिन सरकार का यह काम अवश्य हो सकता है कि वह जीवन में तनाव की स्थितियों को कम करने
के कारगर उपाय लागू कर सके। इसमें भी तात्कालिक उपाय हो सकता है कि अपने
कर्मचारियों और अधिकारियों की समस्याओं को तत्काल सुलझाया जाए। इससे न केवल अनेक
समस्याओं से बचा जा सकता है बल्कि कार्यालय में सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण
भी किया जा सकता है। यदि सरकार ऐसी घटनाओं को हल्के रूप में लेती है, तो चाहे
पुलिस और दमकलकर्मी कितनी भी कोशिश करले मुत्थू जैसे व्यक्ति टावर से आसानी से
नहीं उतरते, भले ही वह अपनी जान दे देते हैं।


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