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Wednesday, April 20, 2011

कलम, समझ और सोच है तो पत्रकारिता में करियर आजमाइए

पत्रकारिता में करियर गढ़ने का सपना देखने वाले विद्यार्थी अब कूद सकते हैं पत्रकारिता की पढ़ाई के मैदान में । प्रवेश परीक्षाओं का समय आ गया है और आवेदन मांगे जाने लगे हैं। पत्रकारिता का कोर्स महज एक कोर्स नहीं है, यह कोर्स अपने कार्य के लिए प्रतिबद्धता मांगता है। यदि आप प्रतिबद्ध हैं, आपकी लेखनी में दम है तो आइए यह क्षेत्र आपके लिए है।

पत्रकारिता कोर्स में दाखिला संबंधी कुछ जानकारियां :

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन

कोर्स : पीजी डिप्लोमा इन हिंदी जर्नलिज्म, पीजी डिप्लोमा इन इंग्लिश जर्नलिज्म, पीजी डिप्लोमा इन एडवरटाइजमेंट एंड पब्लिक रिलेशन
आवेदन पत्र मिलने की तिथि : 21 मार्च 2011 से शुरू
आवेदन पत्र मिलने की अंतिम तिथि : 18 अप्रैल 2011
आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि : 18 अप्रैल 2011
लिखित प्रवेश परीक्षा(उड़ीया जर्नलिज्म को छोड़कर) : 24 मई 2011

साक्षात्कार की तिथि : जून के अंतिम सप्ताह में
सत्र शुरू होने की तिथि : जुलाई के अंतिम सप्ताह में
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें : इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन, अरूणा आसफ अली मार्ग, जेएनयू न्यू कैंपस, नई दिल्ली-110067, वेबसाइट : www.iimc.nic.in
हालांकि आईआईएमसी ने सीटों की संख्या जाहिर नहीं की है फिर भी बीते सालों को देखते हुए ऐसा माना जा सकता है कि प्रत्येक शाखाओं में तकरीबन 40 से 45 सीटें होती है।

एजे किदवई मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर

आवेदन-पत्र : आवेदन-पत्र मार्च 2011 से
आवेदन की अंतिम तारीख : 26 अप्रैल 2011
कोर्स : एमए इन मास कम्यूनिकेशन
अवधि : 2 साल, सीट : 50
प्रवेश परीक्षा : 8 मई 2011
योग्यता : आर्ट, ह्यूमैनिटी, सामाजिक विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल या कॉमर्स आदि विषयों में ग्रेजुएट उम्मीदवार आवेदन कर सकता है। ग्रेजुएशन में एग्रीगेट 50 प्रतिशत अंक या उससे ज्यादा आवश्यक हैं। ग्रेजुएशन की डिग्री तीन साल या इससे ज्यादा अवधि की होना चाहिए।

उम्मीदवार की आयु 1 अगस्त 2006 तक 30 वर्ष से ज्यादा की न हो। आवेदक को आवेदन-पत्र के साथ एक स्टेटमेंट ऑफ पर्पज जमा करना होगा।

प्रवेश प्रक्रिया : प्रवेश परीक्षा दो चरणों में होगी। पहले चरण में लिखित परीक्षा और दूसरे चरण में साक्षात्कार।

लिखित परीक्षा में दो पेपर होंगे। उम्मीदवार की योग्यता, एप्टीट्यूड, रचनात्मक शैली, भाषा ज्ञान, सामान्य ज्ञान और उसके विचार को परखने के लिहाज से इन पेपर को तैयार किया जाएगा। लिखित परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया जाएगा। कुल सीट से तीन गुना उम्मीदवारों को साक्षात्कार हेतु बुलाया जाएगा।

प्रवेश परीक्षा : प्रवेश परीक्षा के लिए नंबरों को चार भागों में बांटा गया है। पेपर 1 के लिए 200 अंक होंगे जिसमें उम्मीदवार के ज्ञान और एप्टीट्यूड का परीक्षण होगा। पेपर 2 में मीडिया एनालिसिस के लिए 40 अंक निर्धारित हैं। उम्मीदवार के पोर्टफोलियो के लिए 100 अंक होंगे जिसमें उनकी मीडिया से जुड़ी गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाएगा और साक्षात्कार के लिए 60 अंकों का निर्धारण किया गया है। इस तरह प्रवेश परीक्षा में कुल मिलाकर 400 अंक होंगे।

कोर्स : एमए इन कनवर्जेट जर्नलिज्म,
प्रवेश परीक्षा : 7 मई 2011
अवधि : 2 साल, सीट : 20
योग्यता : कम से कम 50 प्रतिशत अंक के साथ ग्रेजुएशन डिग्री
प्रवेश प्रक्रिया : उम्मीदवार को आवेदन-पत्र के साथ एक स्टेटमेंट ऑफ पर्पज जमा करना होगा। इसके अलावा प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार देना होगा।
प्रवेश परीक्षा : परीक्षा के लिए 300 अंक निर्धारित किए गए हैं। जिसमें लिखित परीक्षा के लिए 200, साक्षात्कार के लिए 45 और पोर्टफोलियो के लिए 55 अंक होंगे। लिखित परीक्षा दो भागों में विभाजित होगी। पहले भाग में १क्क् वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे, जिसमें प्रत्येक प्रश्न के लिए 1 अंक निर्धारित है। दूसरे भाग में 5 विवरणात्मक प्रश्न होंगे, जिसमें प्रत्येक प्रश्न 15 नंबर का होगा। लेखनशैली और भाषाज्ञान परखने के लिए 25 नंबर रखे गए हैं। दोनों भागों को पूरा करने के लिए उम्मीदवारों को चार घंटे का समय मिलेगा।

कोर्स को-ऑर्डिनेटर : प्रो. एम कासिम
फोन नंबर : 011-26987285/6832/6813
ईमेल : mkasim.mcrc@jmi.ac.in

पता : एजेके मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय
मौलाना मोहम्मद अली जौहर मार्ग
नई दिल्ली-110025
फोन नंबर : 011-26987285, 26986812
एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म(एसीजे)
कोर्स : पीजी डिप्लोमा इन प्रिंट, न्यू मीडिया, टेलीविजन एंड रेडियो
अवधि : एक साल
योग्यता : ग्रेजुएशन
प्रवेश प्रक्रिया : कोर्स में चयन के लिए दो चरणों मंे परीक्षा होगी, पहले चरण में लिखित परीक्षा होगी, लिखित परीक्षा में चयनित विद्यार्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा।
आवेदन पत्र की तिथि : आवेदन पत्र वेबसाइट www.asianmedia.org.in से डाउनलोड किया जा सकता है। पोस्ट से आवेदन मंगाने के लिए इस पते पर लिखें- रजिस्ट्रार, एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, सेकंड मैन रोड, तारामानी, चैन्नई-600113, फोन नंबर - 044-22542840/22542842
आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि : 30 अप्रैल 2011
लिखित परीक्षा : मई 2011 के अंत में
साक्षात्कार : जून 2011
सत्र शुरू : 11 जुलाई 2011
कैसे करें आवेदन : आवेदन पत्र के साथ 100 रुपए का डिमांड ड्राफ्ट मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के फेवर में पेबल एट चैन्नई भेजें। एससी/एसटी वर्ग को प्रमाण-पत्र देने पर आवेदन शुल्क जमा करने की छूट मिलेगी।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें : एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, सेकंड मैन रोड(एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशनके पीछे), तारामानी, चैन्नई-600113, फोन नंबर - 044-22542840/22542842

सिम्बायसिस इंस्टीटच्यूट ऑफ मीडिया एंड कम्यूनिकेशन

कोर्स : बैचलर ऑफ मीडिया स्टडीज
योग्यता : कम से कम 50 प्रतिशत (एससी/एसटी वर्ग के लिए 45 प्रतिशत) अंक के साथ १२वीं पास। १२वीं की परीक्षा दे रहे विद्यार्थी भी आवेदन कर सकते हैं।
सीट : 120 सीट
आरक्षण : एससी - 15 प्रतिशत, एसटी - 7.5 प्रतिशत, विकलांग - 3 प्रतिशत, 120 सीटों के अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर माइग्रेंट्स के लिए 2 सीट और एनआरआई व पीआईओ के लिए 15 प्रतिशत सीटे
ऑनलाईन आवेदन की अंतिम तिथि : 14 मई 2011
द्वितीय चरण के लिए चयन : 21 मई 201
द्वितीय चरण : 28-29 मई 2011 और 4-5 जून 2011
मेरिट लिस्ट की घोषणा : 6 जून 2011
फीस जमा करने की अंतिम तिथि : 18 जून 2011

सत्र शुरू होने की तिथि : 27 जून 2011

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें :
सिम्बायसिस इंस्टीटच्यूट ऑफ मीडिया एंड कम्यूनिकेशन
सर्वे नंबर 231, विमाननगर, पुणे-411014, महाराष्ट्र
फोन नंबर : 020-26634511/12/13/14
वेबसाइट : www.simcug.edu.in
ईमेल : contactus@simcug.edu.in

 

उपेक्षित है आम्रपाली की कला चेतना



ND

विश्व को अहिंसा का मंत्र बताने वाले भगवान बुद्ध को अपने मानवीय तत्व से आकर्षित और प्रभावित करने वाली वैशाली गणतंत्र की राजनर्तकी 'आम्रपाली' की कला चेतना अध्ययन तथा शोध के अभाव में आज भी उपेक्षित है। 

इतिहासकारों के अनुसार अपने सौंदर्य की ताकत से कई साम्राज्य को मिटा देने वाली आम्रपाली का जन्म आज से करीब 25 सौ वर्ष पूर्व वैशाली के आम्रकुंज में हुआ था। वह वैशाली गणतंत्र के महनामन नामक एक सामंत को मिली थी और बाद में वह सामंत राजसेवा से त्याग पत्र देकर आम्रपाली को पुरातात्विक वैशाली के निकट आज के अंबारा गाँव चला आया। जब आम्रपाली की उम्र करीब 11 वर्ष हुई तो सामंत उसे लेकर फिर वैशाली लौट आया। 

इतिहासकारों का मानना है कि 11 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही आम्रपाली को सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर नगरवधु या वैशाली जनपद 'कल्याणी' बना दिया गया था। इसके बाद गणतंत्र वैशाली के कानून के तहत आम्रपाली को राजनर्तकी बनना पड़ा।

प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृतांतों में भी वैशाली गणतंत्र और आम्रपाली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। दोनों ने लगभग एकमत से आम्रपाली को सौंदर्य की मूर्ति बताया। वैशाली गणतंत्र के कानून के अनुसार हजारों सुंदरियों में आम्रपाली का चुनाव कर उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी घोषित कर जनपद कल्याणी की पदवी दी गई थी। 

ND
आम्रपाली के रूप की चर्चा जगत प्रसिद्ध थी और उस समय उसकी एक झलक पाने के लिए सुदूर देशों के अनेक राजकुमार उसके महल के चारों ओर अपनी छावनी डाले रहते थे। वैशाली में गौतम बुद्ध के प्रथम पदार्पण पर उनकी कीर्ति सुनकर उनके स्वागत के लिए सोलह श्रृंगार कर अपनी परिचारिकाओं सहित गंडक नदी की तीर पर पहुँची। 

आम्रपाली को देखकर बुद्ध को अपने शिष्यों से कहना पड़ा कि तुम लोग अपनी आँखें बंद कर लो..., क्योंकि भगवान बुद्ध जानते थे कि आम्रपाली के सौंदर्य को देखकर उनके शिष्यों के लिए संतुलन रखना कठिन हो जाएगा। 

माना जाता है कि आम्रपाली के मानवीय तत्व से ही प्रभावित होकर भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी संघ की स्थापना की थी। इस संघ के जरिए भिक्षुणी आम्रपाली ने नारियों की महत्ता को जो प्रतिष्ठा दी वह उस समय में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। 

ND
मगध सम्राट बिंबसार ने आम्रपाली को पाने के लिए वैशाली पर जब आक्रमण किया तब संयोगवश उसकी पहली मुलाकात आम्रपाली से ही हुई। आम्रपाली के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर बिंबसार पहली ही नजर में अपना दिल दे बैठा। माना जाता है कि आम्रपाली से प्रेरित होकर बिंबसार ने अपने राजदरबार में राजनर्तकी के प्रथा की शुरुआत की थी। बिंबसार को आम्रपाली से एक पुत्र भी हुआ जो बाद में बौद्ध भिक्षु बना।

बौद्ध धर्म के इतिहास में आम्रपाली द्वारा अपने आम्रकानन में भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों को निमंत्रित कर भोजन कराने के बाद दक्षिणा के रूप में वह आम्रकानन भेंट देने की बड़ी ख्याति है। इस घटना के बाद ही बुद्ध ने स्त्रियों को बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी थी। आम्रपाली इसके बाद सामान्य बौद्ध भिक्षुणी बन गई और वैशाली के हित के लिए उसने अनेक कार्य किए। उसने केश कटा कर भिक्षा पात्र लेकर सामान्य भिक्षुणी का जीवन व्यतीत किया। 

विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतांतों में वैशाली और वैशाली की नगर वधु अप्रतिम सुंदरी आम्रपाली का जो वर्णन किया गया है न केवल काफी महत्वपूर्ण है बल्कि इससे वैशाली गणराज्य के वैभव-संपन्नता और स्वर्णिम इतिहास की झलक भी मिलती है। 

करीब डेढ़ दशक पूर्व वैशाली महोत्सव समिति ने अंबारा गाँव में आम्रपाली की संगमरमर की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित करने और आकर्षक आम्रकानन के निर्माण की योजना तैयार की थी। इसके साथ ही वहाँ स्थित प्राकृत जैन शोध संस्थान में उसकी कला चेतना के अध्ययन तथा शोध की व्यवस्था होनी थी, लेकिन अभी तक इस योजना को मूर्त रूप देने मे प्रशासन विफल रहा है जिससे आम्रपाली आज भी उपेक्षित है।
 (वार्ता) 

Monday, April 11, 2011

अंग्रेजी सीखने के आसान तरीके-

 
कोई भी भाषा सीखने में जहाँ उसे दूसरे के द्वारा बोला हुआ या लिखा हुआ ठीक-ठीक समझने की जरूरत होती है, वहीं इंटरप्रिटेशन भी ठीक से आना चाहिए याने भाषा की समझ व उसकी अभिव्यक्ति दोनों ही जरूरी हैं।

हम अपनी मातृभाषा की सीख पर ध्यान देकर देखें तो हमें पता चलेगा कि हमने उसे अपनी फेमेली और आस-पड़ोस में दिन-रात सुनकर व बोलकर सीखा है। उसके लिए हमारे पैरेंट्स ने न कोई क्लास लगाई, न कोई टीचर रखा। इस तरह अंग्रेजी भी सीखी जा सकती ह

भाषा बोलने वालों का माहौल- अँग्रजी चूँकि हमारे यहाँ आम भाषा नहीं है तो उसका हमें ठीक मातृभाषा की तरह का माहौल तो नहीं मिल सकता, पर बहुत-कुछ वैसा ही हम निर्मित कर सकते हैं। पहले तो चौथी-पाँचवीं कक्षा तक अपनी मातृभाषा का अभ्यास बहुत अच्छा कर लें। इसके बाद ऐसा स्कूल चुनें, जहाँ अंग्रेजी में पढ़ाई होती हो, तो आपको भाषा बार-बार सुनने को मिलेगी। स्कूल से आने पर जब भी टीवी देखें तो अंग्रेजी में चल रहे कार्यक्रम बार-बार ध्यान से सुनते रहें, भले ही उनकी बातें आप पूरी तरह न भी समझ पाएँ।

इसी तरह रेडियो या ट्रांजिस्टर पर भी अंग्रेजन्यूज पेपर औदूसरे अंग्रेजी के कार्यक्रम सुनते रहें। याद रखें, भाषा सीखने का पहला कदम सुनते रहने से ही शुरू होता है। हिन्दी न्यूज पेपर के ठीक बाद यदि अंग्रेजी न्यूज पेपर भी टीवी पर उन्हीं दृश्यों के साथ देखेंगे तो निश्चित रूप से आपकी अंग्रेजी की समझ लगातार बढ़ती जाएगी।

माहौल में सुने हुए सेंटेस को खुद बोलने की प्रैक्टिस- पहले तो सही रिफर्रेंस में आप सीन देखकर कोई बात सुनेंगे तो निःसंदेह बहुत-कुछ समझ में आएगा। सुने हुए छोटे-छोटे सेंटेंस बने तो नोट कर लें या याद रह जाएँ तो उन्हें बार-बार दोहराएँ। उन्हीं में नामों की जगह अपने घर के लोगों के नाम रखकर वैसे ही और वाक्य भी बोलें। याद रखें, अंग्रेजी भी अन्य भाषाओं की तरह पहले बोलना सीखनी चाहिए, लिखना व पढ़ना बाद में।

अपने भाई-बहनों और फ्रेड सर्कल के बीच डिस्कशन में बोलते रहने का अभ्यास बहुत करें। बोलने में थोड़ी गलती होगी तो उसकी परवाह न करें, क्योंकि मातृभाषा सीखते समय हमारे घर के बच्चे भी गलती करके सीखते हैं। हाँ, अगर ठीक बोलने में घर के किसी बड़े या अंग्रेजी ट्यूटर की भी मदद मिल सकती हो, तो बोलना जल्दी आ सकेगा और गलतियाँ भी कम होती जाएँगी।

वोकेब (शब्दकोश) बढ़ाएँ- याद रखें भाषा की नींव शब्दों के साथ-साथ सेंटेंस हैं, पर सेंटेंस शब्दों के सही संयोग से ही बनते हैं तो हम लगातार नए शब्दों को सेंटेंस व सही रिफर्रेंस में सीखते चले जाएँ। किसी शब्द की केवल सही स्पेलिंग और मिनिंग याद कर लेना पर्याप्त नहीं है। उसका सही जगह उपयोग भी आना चाहिए। बेशक डिक्शनरी तो आपके पास होनी ही चाहिए, जिसमें से मिनिंग निकालें और याद करें।

शब्दों के अर्थ भी संदर्भ से जुड़कर बदलते रहते हैं, तो उन्हें वाक्यों में प्रयोग करना सीखना चाहिए व सही परिस्थिति से जोड़कर। तो, शब्द कोश की लगातार बढ़ोतरी से भाषा सीखने में उसी तरह मदद मिलती है जैसे किसी बिल्डिंग बनाने में लगातार मटेरियल लाना ही पड़ता है।

ग्रामर- ग्रामर पहले पढ़कर ही लेंग्वेज सीखी जाती हो, ऐसा नहीं है। हमने अपनी मातृभाषा भी बिना ग्रामर पढ़े समझने और बोलने की प्रैक्टिस करके ही सीखी थी। ग्रामर भले ही सीधे अंग्रेजी की प्रैक्टिस नहीं कराती, पर वह एक सही स्टेज पर सीखने में भी सहायक होती है और उसकी गलतियाँ भी दूर करती है। जैसे हम सामान्य रूप से चलना तो बचपन में गिरते-पड़ते सीख जाते हैं, पर सैनिक बनना चाहें तो मार्चिंग के लिए हमें नियम-कायदे सीखने ही होते हैं और उसकी प्रैक्टिस भी उतनी ही जरूरी है। इस तरह की ग्रामर 'वॉकिंग' सीखे हुए को 'मार्चिंग' सिखा देती है अतः बोलने प्रैक्टिस करते हुए ग्रामर का भी सहारा लें।

दोस्ती के लिए दोस्ती

कहा जाता है कि इंसान की उम्र सालों से नहीं बल्कि उसके दोस्तों की संख्या से मापी जानी चाहिए। दोस्त बनाना और दोस्त बनना दोनों ही कुछ विशेषताओं की माँग करती है।  कुछ सुझाव जो आपको अच्छे दोस्त बनना तो सिखाएँगे ही एक अच्छा दोस्त तलाशने में भी मदद करेंगे।

जीवन भर के लिए दोस्ती
किसी भी व्यक्ति से नई-नई दोस्ती करने या अपने किसी पुराने दोस्त के साथ अपनी दोस्ती को प्रगाढ़ करने के लिए आप सोच विचार का कुछ समय रखें। हड़बड़ा कर कोई भी कदम न उठाएँ, क्योंकि दोस्ती के नियम के अनुसार यदि आपने एक बार किसी को अपना दोस्त बना लिया, तो वह जीवनभर के लिए आपका दोस्त बन जाएगा।

पहल करें
अक्सर यह देखा गया है कि जहाँ छोटे बच्चे बहुत जल्दी से किसी के साथ भी घुलमिल जाते हैं और शीघ्र ही नए दोस्त बना लेते हैं, वहीं बड़े यह तक नहीं जान पाते हैं कि आखिर उनके पड़ोस में कौन रहता है? कारण यह होता है कि बच्चे बड़ों की अपेक्षा दोस्ती की डगर पर कदम बढ़ाने के मामले में कम आशंकित रहते हैं।

इसलिए बड़ों को भी दोस्ती के मामले में बच्चों से सीख लेनी चाहिए। अपने दिल और दिमाग के दरवाजे हमेशा खुले रखने चाहिए, आसपास आना-जाना चाहिए,पहली बार मिलने पर नए लोगों से भी खुद ही आगे बढ़कर अभिवादन और बातचीत करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

विनोदी हो स्वभाव
एक सच्चा दोस्त पाने के लिए एक इंसान को व्यावहारिक होने के साथ ही विनोदप्रिय भी होना चाहिए। विनोदप्रियता तो हर व्यक्ति के लिए आकर्षण का एक भाव पैदा करती है।

पॉजीटिव सोचें
हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए बातें करें और अपने व्यवहार में सकारात्मक पक्ष को बढ़ावा दें। सकारात्मक लोग दूसरों को हमेशा अपनी ओर से आकर्षित करते हैं और उन्हें किसी से भी दोस्ती करने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती।

साथ निभाएँ
सच्ची दोस्ती में अपने दोस्त के प्रति वफादार होना जरूरी है। आमतौर पर जब भी लोग किसी प्रकार की व्यक्तिगत या करियर से जुड़ी समस्या का सामना करते हैं तो ऐसे मौकों पर अधिकांशतः दोस्त ही उनका साथ देते हैं। इसलिए दोस्त का हर कदम पर साथ देना दोस्ती का सबसे बड़ा नियम है।

सुनना सीखें
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग दूसरों की बातों को अधिक गौर से सुनते हैं, वे हमेशा लोकप्रियता हासिल करते हैं। जबकि जो लोग खुद को दूसरों पर हावी करने के लिए बिना सोचे-समझे केवल अपनी अच्छाइयों का ही गुणगान करते हैं, उनका सामाजिक दायरा लगातार सिकुड़ता जाता है।
(अंशतः संकलित )

Thursday, April 7, 2011

मधुशाला




बच्चन हिन्दी काव्य प्रेमियों के सबसे अधिक प्रिय कवि रहे हैं और
उनकी 'मधुशाला'आज भी लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर 
विराजमान है सर्वप्रथम 1935 में प्रकाशित होने के बाद से अब तक
 इसके 
अनेक संस्करणों की कई लाख प्रतियाँ
 करोड़ों पाठकों तक पहुँच चुकी हैं। महाकवि पंत ने कहा था- 'मधुशाला 
कीमादकता अक्षय है।' 

'मधुशाला' में हाला, प्याला, मधुबाला और मधुशाला के चार प्रतीकों के
 माध्यम से कवि ने अनेक क्रांतिकारी, मर्मस्पर्शी, रागात्मक एवं 
रहस्यपूर्ण भावों को वाणी दी। 


-हरिवंश राय बच्‍चन 

मदिरालय जाने को घर से 
चलता है पीनेवाला, 
'किस पथ से जाऊँ?' 
असमंजस में है वह भोलाभाला; 
अलग-अलग पथ बतलाते सब 
पर मैं यह बतलाता हूँ-
'राह पकड़ तू एक चला चल, 
पा जाएगा मधुशाला'।

पौधे आज बने हैं साकी 
ले-ले फूलों का प्याला, 
भरी हुई है जिनके अंदर 
परिमल-मधु-सुरभित हाला, 
माँग-माँगकर भ्रमरों के दल 
रस की मदिरा पीते हैं, 
झूम-झपक मद-झंपित होते, 
उपवन क्या है मधुशाला!

एक तरह से सबका स्वागत 
करती है साकीबाला, 
अज्ञ-विज्ञ में है क्या अंतर 
हो जाने पर मतवाला, 
रंक-राव में भेद हुआ है 
कभी नहीं मदिरालय में, 
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक 
है यह मेरी मधुशाला।

छोटे-से जीवन में कितना 
प्यार करूँ, पी लूँ हाला, 
आने के ही साथ जगत में 
कहलाया 'जानेवाला', 
स्वागत के ही साथ विदा की 
होती देखी तैयारी, 
बंद लगी होने खुलते ही 
मेरी जीवन-मधुशाला!

अग्नि पथ



 

SubratoND
हरिवंशराय बच्‍च

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हों भले खड़े, 

हो घने, हो बड़े, 

एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत! 

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी! 

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी!-कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!

यह महान दृश्‍य है- 

चल रहा मनुष्‍य है 

अश्रु-श्‍वेद-रक्‍त से लथपथ, लथपथ, लथपथ! 

Wednesday, April 6, 2011

बासंती नवरात्र की मंगलकामनाये

आध्यात्मिक होने का अर्थ

यह प्रश्न किसी भी जिज्ञासु के मन में उठ सकता है कि हमें ठीक-ठीक ऐसा क्या करना चाहिए ताकि वह जो परम है, जो परमेश्वर है, वह मेरे जीवन में घटित हो सके? सदगुरु इसका उत्तर देते हैं कि अध्यात्म भीगी बिल्लियों के लिए नहीं है, क्या तुम समझ रहे हो? तुम अपने जीवन में और कुछ भी नहीं कर सकते हो, लेकिन सोचते हो कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूँ, ऐसा नहीं है।

अगर तुम इस संसार के किसी भी काम को अपने हाथ में लेकर कर सकते हो, फिर तुम्हारे आध्यात्मिक होने की एक संभावना पैदा हो सकती है, अन्यथा नहीं। अगर तुम्हारे पास इस संसार के किसी भी काम को लेकर और अच्छी तरह से करने की शक्ति और साहस है, तब तुम संभवतः आध्यात्मिक हो सकते हो।

यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो कुछ भी नहीं कर सकते। अभी, पूरे देश के मन में यही बैठा हुआ है, संभवतः पूरे संसार के मन में, कि वे निकम्मे और नालायक लोग, आध्यात्मिक लोग होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित आध्यात्मिक लोग वैसे ही हो गए हैं। वे लोग जो किसी भी चीज को करने के लायक नहीं हैं, वे बस यही करते हैं कि एक गेरुआ वस्त्र पहन कर और किसी मंदिर के सामने बैठ जाते हैं; उनका जीवन सँवर जाता है।

यह अध्यात्म नहीं है, यह वर्दी पहनकर बस भीख माँगना है। अगर तुम्हें अपनी चेतना पर विजय प्राप्त करनी है, अगर तुम्हें अपनी चेतना के शिखर पर पहुँचना है, वहाँ एक भिखारी कभी नहीं पहुँच सकता।

 गौतम बुद्ध तथा उस स्तर के लोग उच्चतम श्रेणी के  हैं। दूसरे सभी निपट भिखारी हैं। मैं तो कहूँगा कि एक सड़क का भिखारी तथा राजगद्दी पर बैठा हुआ एक राजा, दोनों ही भिखारी हैं। वे निरन्तर बाहर से कुछ माँग रहे होते हैं। सड़क का भिखारी हो सकता है कि पैसा, भोजन या आय माँग रहा हो। राजा हो सकता है कि किसी दूसरे राज्य पर विजय, खुशी या कुछ इस तरह की अनर्गल चीजें माँग रहा हो।


गौतम बुद्ध ने केवल अपने भोजन के लिए भिक्षा माँगी, शेष चीजों के लिए वे आत्मनिर्भर थे। दूसरे सभी लोग, बस एक ही चीज के लिए भीख नहीं माँगते, अपना भोजन भीख में नहीं माँगते, बाकी सभी चीजों के लिए भीख माँगते हैं। उनका पूरा जीवन ही भीख माँगना है। केवल भोजन अर्जित करते हैं। लेकिन एक आध्यात्मिक व्यक्ति, केवल भोजन के लिए भिक्षा माँगता है, अन्य सभी चीजें अपने भीतर से अर्जित करता है।

जिस भी तरह से रहना तुम बेहतर मानते हो, उसी तरह से रहो। जिस भी तरह से रहने को तुम जीने का एक सशक्त ढंग मानते हो, उसी तरह से जिओ।

आध्यात्मिक होने का अर्थ है अपने भीतर एक सम्राट होना। होने का यही एकमात्र तरीका है। क्या होने का कोई दूसरा तरीका भी है? कोई व्यक्ति, चेतनापूर्वक, क्या ऐसा होने का चुनाव करेगा, जहाँ पर उसे कोई चीज किसी से या किसी और चीज से माँगनी पड़े? हो सकता है अपनी दयनीयता के कारण उसे माँगना पडे़, लेकिन क्या कोई चेतनापूर्वक ऐसा करने का चुनाव करेगा? क्या हरेक आदमी उस तरह से नहीं होना चाहेगा जहाँ पर वह सौ प्रतिशत अपने आप में हो? इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि तुम्हें पूर्णतः आत्म-निर्भर बनना है।

पारस्परिक-निर्भरता हमेशा होती है, लेकिन तुम्हारे भीतर सभी चीजें मौजूद हैं; तुम्हें बाहर नहीं खोजना है। यहाँ तक कि किसी व्यक्ति के साहचर्य की भी तुम्हें जरूरत नहीं है। अगर दूसरे व्यक्ति को इसकी जरूरत है, तो तुम उसे दे सकते हो, लेकिन अपने आप में, तुम्हें किसी व्यक्ति के साहचर्य की जरूरत नहीं है। इसका अर्थ यह है कि अब तुम अंदर से भिखारी नहीं रह गए हो। केवल बाहरी चीजों के लिए, हो सकता है कि तुम्हें बाहर संसार में जाना पडे़। यही परम मुक्ति है।

जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही हम बन जाते हैं। जिसे भी तुम परम के रूप में मानते हो, स्वभावतः तुम्हारी सारी ऊर्जा उसी तरफ मुड़ जाती है।